यूँ तो सर्दियों में कुछ ख़ास नहीं
बस आब-ओ-हवा सर्द हो जाती है
पर बात सर्दियों की
गाहे-बगाहे ख़ास बन ही जाती है

धूप वो गुनगुनी
और चाय की प्याली

माँ के हाथ की बुनी ऊनी जुराबें
और रज़ाई जयपुर वाली

हवा की तेज़ थपेड़ों से फ़टती चमड़ी
और गालों की लाली

गाजर का हलवा
और पिन्नी काजू किशमिश वाली

यादों और उम्मीदों भरी आहें
और जेबें ख़ाली

लाल-गुलाबी-नारंगी फूलों की बहारें
और पीली ड़ाली-ड़ाली

कटकटाते दाँत, कंपकँपाते बदन
और होठों पे ग़ाली

कितने ही शिक़वें बिना शिकन के सुनती
सर्दियाँ हर साल आती और चली जाती हैं
यूँ तो सर्दियों में कुछ ख़ास नहीं
बस कुछ ख़ास एहसास करा जाती हैं

Advertisements